Thursday, January 13, 2011

वायदा या विनाश

बाजार क्रूर एवं निर्मम होता है यह तो सभी जानते हैं लेकिन मुनाफाखोरी की हद किस सीमा तक जा सकती है यह अगर देखना है तो भारत का कृषि जिन्सों का वायदा बाजार इसका सटीक उदाहरण है। दरअसल सोने-चांदी से लेकर क्रिकेट के खेल तक रातोंरात मुनाफा कमाने वाले सटोरिये सक्रिय हैं, ये सटोरिये किसानों की लंगोटी पर भी हाथ डाल देंगे ऐसी उम्मीद नहीं थी। उस पर तुर्रा कि भारत के कृषिमंत्री शरद पवार खुद ढाल लेकर इन सटोरियों के बचाव में खडे हैं। वास्तव में कृषि जिन्सों का वायदा बाजार एक ऐसा केक है जिसके निर्माता और उत्पादक किसान को केक के हिस्से से सबसे पहले बेदखल कर दिया गया है। वायदा बाजार में मुनाफा का खेल तभी शुरू होता है जब ये कृषि जिन्स किसान के खलिहान से निकलकर किसी बिचौलियों, जमाखोर या बहुराष्ट्रीय कंपनी के गोदामों में पहुंच चुका होता है। अर्थात खेल शुरू होने से पहले ही किसान बाहर।

वायदा कारोबार एक पुराना सट्टा बाजार है जहां बिचौलियों खाद्य उत्पादक और उपभोक्ता के बीच महंगाई की एक बडी दरार बना देते हैं। खाद्यान्नों का सौदा एक बिचौलियों के हाथ से दूसरे, फिर तीसरे और चौथे, पांचवे, छठवें तक चला जाता है। मतलब कीमत बढती जा रही है और मुनाफा सटोरिये कमा रहे हैं। नुकसान किसान और उपभोक्ता का। भारत सरकार ने इस बाजार को वैधानिक बना दिया। देशभर में 24 एक्सचेंज खोल दिए। राष्ट्रीय स्तर के दो एक्सचेंज मुंबई और एक अहमदाबाद में काम कर रहा है। इस बाजार से किसान सीधे तौर पर जुडकर अपने उत्पाद का व्यापारिक बुद्घि के साथ सौदा कर पाएगा और अपनी हालत सुधार सकेगा शायद यही सोच इस बाजार के मूल में रही होगी। परंतु बिचौलियों और सटोरियों ने पूरी तस्वीर उलट दी है। इन बिचौलियों पर केन्द्र की भी नजर है। एक सरकारी कमेटी ने इस कारोबार से बिचौलियों को हटाने की सिफारिश कर दी है यह कहकर कि इनकी वजह से ही किसानों को अपने उत्पाद का कम दाम मिल रहा है और सारी मलाई बिचौलियों खा रहे हैं। दरअसल पूरे देश में वायदा कारोबार को लेकर मतभेद बना हुआ है।
 
कुछ विद्वान कहते हैं कि इस कारोबार की तकनीकी जानकारी किसानों को होती नहीं है और न वो कमोडिटी एक्सचेंज में आते हैं। बिचौलिये ही उनके सारे कारोबार को अंजाम दे देते हैं। आज महंगाई अगर आसमान छू रही है तो उसके पीछे भी वायदा बाजार के यही सटोरिये हैं। कुछ विद्वानों का तर्क है अगर सटोरिये नहीं होंगे तो किसान और खरीददारों के बीच तालमेल कौन बैठाएगा, सौदे कौन करवाएगा। कुल मिलाकर सरकार को किसानों में इतनी जागृति तो लानी होगी कि किसान खुद इस बाजार में अपनी उपज का मोल लगाए तभी महंगाई पर अंकुश लगेगा और किसान भी समर्थ होंगे। इस वायदा बाजार में कई बार उत्पादन से अधिक के सौदे हो जाते हैं। एक जानकारी के मुताबिक ग्वार के बीज का उत्पादन देश में लगभग 16०० लाख मीट्रिक टन हुआ इसके विरुद्घ वायदा बाजार में 1692 मीट्रिक टन का कारोबार हुआ। मतलब कुल उपलब्ध माल से 92 मीट्रिक टन ज्यादा का सौदा हो गया। इसी तरह चीनी, कालीमिर्च, गुड, मेन्था आदि कई वस्तुओं का उपलब्धता से अधिक का व्यापार हो जाता है। देश में मेन्था का उत्पादन 1०० करोड रुपए का है और इसका वायदा कारोबार 1००० करोड रुपए से अधिक का है।

वायदा बाजार पूरी दुनिया में तेजी से बढ रहा है। पहले लोग सोने-चांदी और शेयरों में निवेश करते थे, अब खाद्यान्न भी निवेश का एक बडा कारोबार बन गया है और जब कोई व्यापारी किसी वस्तु में इनवेस्ट करेगा तो भरपूर लाभ भी कमाएगा। फिर इस प्रक्रिया में उत्पादक किसान और उपभोक्ता के आर्थिक विकास की जगह ही कहां बचती है। इस व्यापार में उत्पादन या उपलब्धता से कहीं ज्यादा का कारोबार पहले ही हो जाता है। जब उतनी मात्रा में खाद्यान्न उपलब्ध ही नहीं होगा तो संकट का जन्म स्वाभाविक है।  

Sunday, August 29, 2010

अस्तित्व पर आंच



 किसान आत्महत्या कर रहा है। उसकी खेती की जमीन कहीं शहरीकरण की भेंट चढ़ रही है तो कही कारखानों की चिमनी उसके खेतों को धुएं में उड़ा रही है। मानसून जब पाए तब दगा दे रहा है और जमीन का पानी भी उसका साथ छोड़ रहा है। ऐसे में उसकी भलाई के लिए बनी किसी जनकल्याणकारी सरकार का भी अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेना उसकी बर्बादी का कारण बनता जा रहा है।  


 यह बात कोई गुजरे जमाने की नहीं है कि इस देश में कृषि को उत्तम और चाकरी को निकृष्ट कहा गया है लेकिन जैसे हालात चल रह हैं उसे देखकर यही लगता है कि उत्तम काम करने वाले किसानों को चाकर बनाने की पूरी तैयारी हो रही है। खेती को हमारे मुल्क का अस्तित्व समझा जाता है और आज किसानों का हितैषी होने का पाखंड रचने वाले राजनेता और अकर्मण्य नौकरशाही की मिलीभगत से इस अस्तित्व पर आंच ही नहीं आ रही बल्कि इसे समूल स्वाहा करने का षडयंत्र किया जा रहा है। विगत के वर्षो में कभी सरकार और उसके नुमाइंदे इतने निर्मम नहीं दिखे जितने कि आज नजर आ रहे हैं। किसान आत्महत्या कर रहा है। उसकी खेती की जमीन कहीं शहरीकरण की भेंट चढ़ रही है तो कही कारखानों की चिमनी उसके खेतों को धुएं में उड़ा रही है। मानसून जब पाए तब दगा दे रहा है और जमीन का पानी भी उसका साथ छोड़ रहा है। ऐसे में उसकी भलाई के लिए बनी किसी जनकल्याणकारी सरकार का भी अपनी जवाबदेही से पल्ला झाड़ लेना उसकी बर्बादी का कारण बनता जा रहा है।


किसानों के सामने आज जो विराट संकट खड़े हैं उनमें पहला यह कि उसे उसकी परंपरागत खेती से उसे भटका दिया गया है और वह कैसे अपने पूर्वजों की विरासत को वापस हासिल करे। दूसरा विकास के नाम पर हो शहरीकरण और औद्योगिकरण ने उसकी जमीनों को निगलना शुरू कर दिया है और वह बर्बादी के मुआवजे से कैसे वापस किसी जमीन को खेती के लायक तैयार करे। मानसून की बेरूखी और लगातार गिरते जलस्तर ने उसकी नींदें उड़ा रखी है जिसका वह जिममेदार नहीं है। पहले बात करें परंपरागत खेती कि तो हम पाएंगे कि पिछले कुछ बरसों से इस देश का किसान किसी साजिश के तहत परंपरागत खेती से दूर किया जा रहा है। उन्नत बीजों के नाम पर और भरपूर पैदावार के नाम पर वह धंघेबाजों के हाथों छला जा रहा है। दरअसल इस देश के कृषि वैज्ञानिकों को यह लगता है कि किसान को खेती करना आता ही नहीं और उसे वे खेती के तौर तरीके सिखाने में लगे हैं। उसे यह समझाने में लगे हैं कि भरपूर उत्पादन से ही उसकी तरककी का रास्ता खुलेगा और इसके लिए उसे अपनी पारंपरिक खेती को तजना होगा। प्रमाणित बीजों के नाम पर उससे उसका पारंपरिक बीज बैंक छीना जा रहा है और अब तो इस काम में दुनिया की कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी शामिल हो गई हैं जिनके साथ हमारी सरकारें भी सुर में सुर मिला रही हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बीजों पर अपना एकाधिकार जमाने और किसानों को हर बार उन पर आश्रित रहने के लिए विवश करने की प्रक्रिया भी तेज कर दी है। इन सभी प्रयासों के पीछे जो तर्क दिया जा रहा है वह यह कि देश को संभावित खाद्यान्न संकट से बचाने के लिए ऐसा करना जरूरी है कि किसान इन कंपनियों का बीज लगाकर पैदावार बढ़ाएं। पैदावार को देश की खद्यान्न सुरक्षा के साथ जोड़कर देखा जा रहा है और यह सच भी है कि किसान की पैदावार ही खाद्यान्न सुरक्षा को तय करती है लेकिन पिछले कुछ सालों से लगातार खेती में असफल हो रहे या कर्ज के बोझ से दब रहे किसानों ने अपनी जीवनलीला समाप्त करना शुरू कर दिया है। किसान घाटे की खेती से त्रस्त है और उसे कोई दूसरा रास्त दिख नहीं रहा है। विकसित देशों में सरकारें किसानों को तगड़ा अनुदान देकर घाटे से उबारती है लेकिन भारत  में ऐसा शायद इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि नकदी फसल को बढ़ावा देने के नाम पर महंगा बीज और कीेटनाशक बेचने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों की हमारे सिस्टम पर पकड़ किसानों से ज्यादा है। किसान कर्ज में दबकर आत्महत्या कर रहा है क्योंकि उसे गेहूं का भाव नहीं मिल रहा और जब गेहूं का भाव बढ़ता है तो सरकार महंगी दरों पर गेहूं आयात करने लगती है।

किसी भी देश में ऐसा नहीं होता। खाद्यान्न की आत्मनिर्भरता के लिए भरपूर पैदावार की जरूरत है लेकिन यह पैदावार किस कीमत पर? खाद्यान्न के नाम पर जहां इतना हाहाकार मचा हुआ है वहीं करोड़ों टन खाद्यान्न खुले में पड़ा सड़ रहा है। जहां खाद्यान्न एक समस्या है वहां उसे उगाने वाले किसानों की अपनी समस्याएं हैं। देश का किसान मौसम की बेरूखी से हर बरस परेशान होता है। मानसून के दगा देने के बाद जमीन के भीतर का पानी उसके लिए एक आसरा होता है लेकिन यह सहारा भी धीरे-धीरे उसका साथ छोड़ रहा है। यह माना जा रहा है कि  आने वाले पंद्रह वर्षो में भूमिगत जल की उपलब्धता ऋणात्मक हो जाएगी। क्योंकि जिस गति से पानी भूमि में समाता है उससे तीस फीसदी अधिक रफ्तार से पानी वापस खींचा जा रहा है। भू-जल का इस दोहन का दोष केवल किसानों के माथे पर नहीं मढ़ा जा सकता तेजी से बढ़ रहा शहरीकरण और औद्योगिकरण भी इसके जिममेदार हैं। छत्तीसगढ़ में राज्य बनने के बाद विकास की रफ्तार एकाएक बढ़ी है जो अनवरत जारी है। चारों तरफ निर्माण ही निर्माण। जमीनों का अधिग्रहण हो रहा है। उद्योग-धंधे किसानों के खेतों को लील रहे हैं। राज्य की राजधानी रायपुर के चारों तरफ इसकी बानगी देखी जा सकती है। नई राजधानी की परियोजना ने धान उगलने वाले खेतों को खत्म कर दिया है। तेजी से बढ़ रहा शहरीकरण भी इस काम में पीछे नहीं है।

औद्योगिकीकरण के चलते खेत के मालिक किसान अपनी ही खेतों में लगी फैक्ट्री में चाकरी कर रहे हैं। प्रदेश में कम हो रही खेती की जमीन का क्या विकल्प तैयार किया जा रहा है? छत्तीसगढ़ में केवल धान की खेती होने के कारण किसानों को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ता है। इन खेतों को दो फसलीय बनाने के लिए सुस्त प्रयास किए जा रहे हैं। रबी फसलों के लिए जिस भू-जल की किसानों को आवश्यकता होगी वह भी राज्य में तेजी से गिर रहा है। इसका कारण कोई किसान नहीं बल्कि बढ़ता हुआ शहरीकरण व औद्योगिकरण है। एक अनुमान के मुताबिक देश के जिन भागों में चावल की खेती होती है उन क्षेत्रों में भू-जल प्रतिवर्ष एक फुट की दर से गिर रहा है। दिलचस्प बात तो यह है कि पानी की कमी वाले इलाकों में पानी की अधिक खपत वाली खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है। महाराष्ट्र का उदाहरण लें तो यहां कुल खेती की दस फीसदी जमीन पर गन्ना होता है और यह खेती भूमिगत जल को अस्सी फीसदी कम कर देती है मतलब शेष नब्बे फीसदी खेती के लिए बीस फीसदी पानी भी नहीं बचता। उस पर से हाईब्रीड बीज पर जोर देना जो पानी की खपत बढ़ाते हैं और तो और अब तो जीएम फसल पर जोर दिया जा रहा है। कुलमिलाकर बात यह है कि किसान महंगी खेती के बाद अपनी लागत नहीं निकाल पा रहे हैं और सरकार पैदावार बढ़ाने के नाम पर उन्हें बीजऔर कीटनाशक माफियाओं के हवाले किए दे रही है। देश में भुखमरी का निदान बम्पर पैदावार नहीं बल्कि खाद्यान्न का बेहतर प्रबंधन है।

देश के प्रख्यात खाद्य और कृषि विश्लेषक देवेंद्र शर्मा का मत है कि देश का एक साल पेट भरने के लिए लगभग 1.1लाख करोड़ रूपए की जरूरत होगी अगर गेहूं और चावल के भंडारण की उचित व्यवस्था कर दी जाए और खाद्यान्न की बर्बादी रोक दी जाए प्रत्येक परिवार को 45 किलोग्राम तक खाद्यान्न मिल सकता है। बात केवल इतनी है कि देश में खाद्यान्न संकट गहरा रहा है और इसे दूर करने वाला किसान हताश हैं। पैदावार बढ़ाने का दबाव आत्महत्या की परिणति के रूप में सामने आ रहा है। खाद्यान्न के लिए चिंतित सरकार के खाद्यान्न प्रबंधन की बानगी देखिए कि करोड़ों टन खाद्यान्न खुले में सड़ रहा है। वक्त खाद्यान्न संकट को खत्म करने के लिए विचार करने का है और एक बेहतर रणनीति के तहत इस पर अमर करने का है लेकिन इसके लिए देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसानों को आत्महत्या की दहलीज पर लाकर खड़ा नहीं किया जा सकता।